पिछले दशक यानि 2001 से 2010 के बीच में आंध्र-प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक में कुल एक लाख के आस पास किसानों ने आत्महत्या कर ली ,आज भी कर रहे हैं। कारण- वे GM (जेनेटिकली मोडीफाइड) BT-Cotton उगा रहे थे, जिसकी लागत बहुत ज्यादा थी लेकिन मुनाफा कौड़ी के भाव था, यहाँ तक की किसानों ने घाटे में भी अपने माल बेचा जिस कारण कर्ज में आ गए और जिंदगी बर्बाद हो गई है और आत्महत्या कर बैठे।
क्या हैं ये जीएम बीज?
क्या हैं ये जीएम बीज?
ये बीज प्रयोगशाला में सामान्य बीजों की जीन में जेनेटिक इंजीनियरिंग के माध्यम से परिवर्तन करके कृत्रिम रूप से तैयार किये जाते हैं। इन बीजों में कोई विशेष गुण डाला जाता है तथा इन बीजों को सिर्फ एक बार उपयोग किया जा सकता है अर्थात् आप अपनी फसल के बीज दुबारा नहीं उपयोग कर सकते।
GM बीजों के लिए कंपनियों पर निर्भरता और कंपनियों की मनमानी
इन जीएम बीजो की लागत ज्यादा होने का कारण यह था कि GM BT-Cotton के बीज के लिए किसानों को कंपनियों पे ही निर्भर होना है । ये बीज प्रयोगशाला में बनाये जाते हैं तथा किसान इस बीज का संरक्षण कर नहीं सकता जैसे पारंपरिक खेती में अब तक करता आया था, क्योंकि BT-Cotton कि संरक्षित बीज किसी काम कि नहीं है। ये बीज उन्हें निश्चित कम्पनियों से ही खरीदने पड़ते हैं और ये कंपनियाँ जब चाहे दाम बढ़ा देती हैं। किसान चाहकर भी अब पुरानी कपास पर नहीं लौट सकते क्योंकि इसका बीज अब बाजार में उपलब्ध ही नहीं है।
GM बीजों से मृदा की उर्वरा क्षमता की हानि
भारत सरकार की ही एजेंसियाँ बता रही हैं कि समय के साथ ये बीज धरती की उर्वरा क्षमता भी डाउन कर डालते हैं जिससे उत्पादन भी कम हो जाता है। किसान पे बढ़े हुए लागत और कम उत्पादन का डबल अत्याचार होता है। एक खेत में तीन चार साल लगातार जीएम फसल उगाने के बाद उस खेत की उर्वरा क्षमता काफी प्रभावित होती हैं क्योंकि ये जीएम फसलें बहुत तेजी से मृदा से पोषक तत्व, भूमिगत जल तथा अन्य कार्बनिक पदार्थों को सोखकर उसको सामान्य फसलों के लिए बेकार कर देती हैं जिससे अधिक उर्वरकों का प्रयोग करना पड़ता है, परिणाम, अधिक लागत और ऊर्वरकों पर निर्भरता।
क्या हम अपने भविष्य को जान बूझकर अंधकार में धकेल रहे हैं ?
ध्यान देने कि बात है कि ये सिर्फ किसानों का मसला नहीं है, यदि ऐसे ही सब कुछ चला और एक दिन किसान सभी प्रकार के भोज्य पदार्थ के लिए GM बीजों पे निर्भर हो गया तो ये कंपनियाँ तय करेंगी कि दाल, चावल, गेंहू, सब्जी ,तेल के दाम क्या होंगे। कम से कम आज भारत खाने के मामले में स्वदेशी है , विदेशों से भीख नहीं माँगना पड़ता। लेकिन तब क्या होगा जब भोजन के लिए भिखारी हो जाएंगे, आपके तनख्वा का कुल हिस्सा आपके भोजन पानी पे व्यय होगा। तब सिर्फ किसान नहीं मरेगा, हर कोई मरेगा। और ऐसी स्थिति में GM food के साइड इफैक्ट जो हैं उस पे तो चर्चा का मतलब ही नहीं।
सरकार, कृषि मंत्रालय और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद सभी को किसानों के पक्ष में काम करना चाहिए जबकि ये उसके विपरीत हो रहा है और उसके परिणाम भी किसानों की आत्महत्याओं के रूप में सामने आ रहे हैं। सरकार से अपील है कि देश के अन्नदाताओं के कल्याण को ध्यान में रखते हुए जीएम फसलों पर एक बार पुनर्विचार करें।
इन जीएम बीजो की लागत ज्यादा होने का कारण यह था कि GM BT-Cotton के बीज के लिए किसानों को कंपनियों पे ही निर्भर होना है । ये बीज प्रयोगशाला में बनाये जाते हैं तथा किसान इस बीज का संरक्षण कर नहीं सकता जैसे पारंपरिक खेती में अब तक करता आया था, क्योंकि BT-Cotton कि संरक्षित बीज किसी काम कि नहीं है। ये बीज उन्हें निश्चित कम्पनियों से ही खरीदने पड़ते हैं और ये कंपनियाँ जब चाहे दाम बढ़ा देती हैं। किसान चाहकर भी अब पुरानी कपास पर नहीं लौट सकते क्योंकि इसका बीज अब बाजार में उपलब्ध ही नहीं है।
GM बीजों से मृदा की उर्वरा क्षमता की हानि
भारत सरकार की ही एजेंसियाँ बता रही हैं कि समय के साथ ये बीज धरती की उर्वरा क्षमता भी डाउन कर डालते हैं जिससे उत्पादन भी कम हो जाता है। किसान पे बढ़े हुए लागत और कम उत्पादन का डबल अत्याचार होता है। एक खेत में तीन चार साल लगातार जीएम फसल उगाने के बाद उस खेत की उर्वरा क्षमता काफी प्रभावित होती हैं क्योंकि ये जीएम फसलें बहुत तेजी से मृदा से पोषक तत्व, भूमिगत जल तथा अन्य कार्बनिक पदार्थों को सोखकर उसको सामान्य फसलों के लिए बेकार कर देती हैं जिससे अधिक उर्वरकों का प्रयोग करना पड़ता है, परिणाम, अधिक लागत और ऊर्वरकों पर निर्भरता।
इतने हानिकारक प्रभावों के बाद भी भारत सरकार द्वारा GM फसलों को बढ़ावा दिया जा रहा है जिससे भविष्य में किसानों की आत्महत्या करवाने की नींव डाली जा रही है
जब सरकार कि ही एजेंसियाँ ऐसा मान रही हैं कि BT-Cotton किसानों के हित में नहीं हैं, इससे केवल GM बीज बनाने वाली कंपनियों का फायदा है तो इससे बड़ा दोगलापन क्या होगा कि भारत सरकार कि ही एजेंसियों ने अब Genetically Modified Mustard यानि GM सरसों को बाजार में रिलीज करने की अनुमति दे डाली। जिससे किसानों में ही भारी आक्रोश है क्योंकि कुछ मूर्ख किसान तो ऐसे होंगे ही जो पहले कुछ साल इस बीज के द्वारा मार्केट कैप्चर करेंगे और प्रकृतिक बीजों पे निर्भर किसान मार्केट से बाहर होगा और सारे किसान सरकार के इस फैसले GM सरसों उगाने को मजबूर होंगे और BT-कॉटन उगाने वाले किसानों की तरह ही अगले कुछ दशकों में अत्महत्या करेंगे।
किसानों का भारी विरोध और सुप्रीम कोर्ट का स्टे
हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने भारी विरोध के बाद इसके रिलीज पे स्टे लगा दिया है, बिहार के नितीश सरकार ने मोदी सरकार से अपील कि है कि ऐसे आत्मघाती निर्णय पे हस्तक्षेप करें। नितीश कुमार का कहना है कि पहले इन कंपनियों ने बाजार में किसानों को साठने का प्रयास किया लेकिन जब किसान नहीं माने तो भारत सरकार कि एजेंसियों को मनाने पहुँच गयी और वो मान गईं, जिसके बाद से विरोध के स्वर बुलंद है।
जब सरकार कि ही एजेंसियाँ ऐसा मान रही हैं कि BT-Cotton किसानों के हित में नहीं हैं, इससे केवल GM बीज बनाने वाली कंपनियों का फायदा है तो इससे बड़ा दोगलापन क्या होगा कि भारत सरकार कि ही एजेंसियों ने अब Genetically Modified Mustard यानि GM सरसों को बाजार में रिलीज करने की अनुमति दे डाली। जिससे किसानों में ही भारी आक्रोश है क्योंकि कुछ मूर्ख किसान तो ऐसे होंगे ही जो पहले कुछ साल इस बीज के द्वारा मार्केट कैप्चर करेंगे और प्रकृतिक बीजों पे निर्भर किसान मार्केट से बाहर होगा और सारे किसान सरकार के इस फैसले GM सरसों उगाने को मजबूर होंगे और BT-कॉटन उगाने वाले किसानों की तरह ही अगले कुछ दशकों में अत्महत्या करेंगे।
किसानों का भारी विरोध और सुप्रीम कोर्ट का स्टे
हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने भारी विरोध के बाद इसके रिलीज पे स्टे लगा दिया है, बिहार के नितीश सरकार ने मोदी सरकार से अपील कि है कि ऐसे आत्मघाती निर्णय पे हस्तक्षेप करें। नितीश कुमार का कहना है कि पहले इन कंपनियों ने बाजार में किसानों को साठने का प्रयास किया लेकिन जब किसान नहीं माने तो भारत सरकार कि एजेंसियों को मनाने पहुँच गयी और वो मान गईं, जिसके बाद से विरोध के स्वर बुलंद है।
क्या हम अपने भविष्य को जान बूझकर अंधकार में धकेल रहे हैं ?
ध्यान देने कि बात है कि ये सिर्फ किसानों का मसला नहीं है, यदि ऐसे ही सब कुछ चला और एक दिन किसान सभी प्रकार के भोज्य पदार्थ के लिए GM बीजों पे निर्भर हो गया तो ये कंपनियाँ तय करेंगी कि दाल, चावल, गेंहू, सब्जी ,तेल के दाम क्या होंगे। कम से कम आज भारत खाने के मामले में स्वदेशी है , विदेशों से भीख नहीं माँगना पड़ता। लेकिन तब क्या होगा जब भोजन के लिए भिखारी हो जाएंगे, आपके तनख्वा का कुल हिस्सा आपके भोजन पानी पे व्यय होगा। तब सिर्फ किसान नहीं मरेगा, हर कोई मरेगा। और ऐसी स्थिति में GM food के साइड इफैक्ट जो हैं उस पे तो चर्चा का मतलब ही नहीं।
सरकार, कृषि मंत्रालय और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद सभी को किसानों के पक्ष में काम करना चाहिए जबकि ये उसके विपरीत हो रहा है और उसके परिणाम भी किसानों की आत्महत्याओं के रूप में सामने आ रहे हैं। सरकार से अपील है कि देश के अन्नदाताओं के कल्याण को ध्यान में रखते हुए जीएम फसलों पर एक बार पुनर्विचार करें।

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