कजरी और राहुल जैसे शातिर और चोरों के गिरोह के सरगना और उनके बहकावे में आए कुछ भोले भाले अच्छे लोग भी पूछते हैं कि पुराने हजार रुपए के नोट हटा कर नए दो हजार के नोट लाने से काले धन पर क्या असर पड़ेगा । बात तो वही रहेगी !!
मुझे लगता है कि हमारे विश्वविद्यालयों में तर्कशास्त्र की शिक्षा होती ही नहीं है । इसीलिए ऐसे शातिराना सवालों की गिरफ़्त में अच्छे लोग भी क़ैद हो जाते हैं ।
अरे भाइयों और बहनों, देवियों और सज्जनों, बात यह है कि पुराने बड़े नोटों का बहुत बड़ा प्रतिशत काले धन की लेन देन और ज़ख़ीरा बनाने में पहले ही इस्तेमाल हो चुका है । इस क़दम से पुराने काले धन का बहुत बड़ा हिस्सा एक झटके में बर्बाद हो जाएगा । लाखों करोड़ का काला धन एक झटके में धुँआ धुंआ । और ध्यान रहे यह ज़ख़ीरा एक दिन में इकट्ठा नहीं हुआ है । अगर नए ज़ख़ीरे बनाने की सुविधा भी हो तो नए ज़ख़ीरे को बनते बनते दसों साल लग जाएँगे ।
जो नए बड़े नोट आएँगे, वे अभी काला बाजार में इस्तेमाल नहीं हुए हैं । होंगे, जरूर होंगे पर इतनी जल्दी उतनी बड़ी मात्रा में नहीं हो पाएँगे, जितने अभी पुराने नोट की शक्ल में हैं । और ऊपर से सरकार और भी तमाम क़दम उठा रही है जिससे नए काले धन का ज़ख़ीरा बनाने में बहुत दिक्कत आएगी ।
और जो नए बड़े नोट आ रहे हैं उनकी संख्या पुराने बड़े नोटों के मुकाबले में बहुत कम होगी । फिलहाल देश की तक़रीबन अस्सी प्रतिशत मुद्रा पुराने बड़े नोटों की शक्ल में है । जब नए नोट आ जाएँगे तो यह प्रतिशत बहुत कम हो जाएगा । और ज़ख़ीरा बनाने में इससे भी दिक्कत आएगी । देश धीरे धीरे cashless अर्थव्यवस्था की तरफ बढ़ेगा ।
इसलिए पुराने काले नोटों की तुलना नए अभी तक सफ़ेद नोटों से करना और ऊलजलूल सवाल उठाना कम से कम नासमझी है या फिर देश को गुमराह करने की काला बाजारियों की साज़िश का हिस्सा है ।
देश में शिक्षा का क्या स्तर है, इस एक बात से ज़ाहिर है कि किसी युवा स्त्री ने जब यही भोला भाला सवाल NDTV पर एक पैनेल डिस्कशन में पूछा तो इतनी सीधी सी बात का सीधा जवाब देने के बजाय स्टेट बैंक के एक भूतपूर्व बहुत बड़े अधिकारी बड़े नोटों की महिमा का बखान करने में लग गए । हमारे यहाँ फ़ोकस करने की, to the point precise बोलने की, ट्रेनिंग ही नहीं है ।
भोला भाला होना बहुत बड़ा गुण है । पर भोला भाला होने के लिए मूर्ख होना कोई आवश्यक शर्त नहीं है, मित्रों ।
नोट: यह पोस्ट प्रदीप सिंह की फेसबुक वॉल से साभार लिया गया है. इस पोस्ट के सभी अधिकार इसके मूल लेखक प्रदीप सिंह के अधीन हैं तथा ज्ञानवाणी ने केवल इसे साभार प्रकाशित किया है। इसके पुनः प्रकाशन या कॉपी पेस्ट के लिए मूल लेखक की पूर्व अनुमति आवश्यक है।
मुझे लगता है कि हमारे विश्वविद्यालयों में तर्कशास्त्र की शिक्षा होती ही नहीं है । इसीलिए ऐसे शातिराना सवालों की गिरफ़्त में अच्छे लोग भी क़ैद हो जाते हैं ।
अरे भाइयों और बहनों, देवियों और सज्जनों, बात यह है कि पुराने बड़े नोटों का बहुत बड़ा प्रतिशत काले धन की लेन देन और ज़ख़ीरा बनाने में पहले ही इस्तेमाल हो चुका है । इस क़दम से पुराने काले धन का बहुत बड़ा हिस्सा एक झटके में बर्बाद हो जाएगा । लाखों करोड़ का काला धन एक झटके में धुँआ धुंआ । और ध्यान रहे यह ज़ख़ीरा एक दिन में इकट्ठा नहीं हुआ है । अगर नए ज़ख़ीरे बनाने की सुविधा भी हो तो नए ज़ख़ीरे को बनते बनते दसों साल लग जाएँगे ।
जो नए बड़े नोट आएँगे, वे अभी काला बाजार में इस्तेमाल नहीं हुए हैं । होंगे, जरूर होंगे पर इतनी जल्दी उतनी बड़ी मात्रा में नहीं हो पाएँगे, जितने अभी पुराने नोट की शक्ल में हैं । और ऊपर से सरकार और भी तमाम क़दम उठा रही है जिससे नए काले धन का ज़ख़ीरा बनाने में बहुत दिक्कत आएगी ।
और जो नए बड़े नोट आ रहे हैं उनकी संख्या पुराने बड़े नोटों के मुकाबले में बहुत कम होगी । फिलहाल देश की तक़रीबन अस्सी प्रतिशत मुद्रा पुराने बड़े नोटों की शक्ल में है । जब नए नोट आ जाएँगे तो यह प्रतिशत बहुत कम हो जाएगा । और ज़ख़ीरा बनाने में इससे भी दिक्कत आएगी । देश धीरे धीरे cashless अर्थव्यवस्था की तरफ बढ़ेगा ।
इसलिए पुराने काले नोटों की तुलना नए अभी तक सफ़ेद नोटों से करना और ऊलजलूल सवाल उठाना कम से कम नासमझी है या फिर देश को गुमराह करने की काला बाजारियों की साज़िश का हिस्सा है ।
देश में शिक्षा का क्या स्तर है, इस एक बात से ज़ाहिर है कि किसी युवा स्त्री ने जब यही भोला भाला सवाल NDTV पर एक पैनेल डिस्कशन में पूछा तो इतनी सीधी सी बात का सीधा जवाब देने के बजाय स्टेट बैंक के एक भूतपूर्व बहुत बड़े अधिकारी बड़े नोटों की महिमा का बखान करने में लग गए । हमारे यहाँ फ़ोकस करने की, to the point precise बोलने की, ट्रेनिंग ही नहीं है ।
भोला भाला होना बहुत बड़ा गुण है । पर भोला भाला होने के लिए मूर्ख होना कोई आवश्यक शर्त नहीं है, मित्रों ।
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